Monday, February 24, 2020

हाशिए पर खिसकता वामपंथ

वाम तबका, इन दिनों, गहरे राजनीतिक, साहित्यिक और सामाजिक 'संकट' से जूझ रहा है। न उसके पास अब कुछ पाने को न खोने को। अधर में लटका हुआ है और हर वक़्त इस संघर्ष में जुटा है कि वापसी कैसे की जाए। वापसी के जो तरीके उसने अपनाए हुए हैं, वो उसका साथ नहीं दे रहे। कभी वो 'आप' की शरण में चले जाते हैं तो कभी 'गांधी' और गांधीवाद की। कभी कांग्रेस के साथ खड़े हो जाते हैं तो कभी समाजवादी पार्टी के साथ। लेकिन जगह और महत्ता उन्हें कहीं नहीं मिल रही। तब उनके पास ग़ालिब की गजल की यह पंक्ति गुनगुनाने के सिवाय कुछ नहीं होता कि 'बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले…'।

वामपंथी और प्रगतिशील वर्ग बड़े जोर-शोर से लगा है, बीजेपी को मात देने में। कभी उसके निशाने पर प्रधानमंत्री होते हैं तो कभी आरएसएस तो कभी राष्ट्रवाद का मुद्दा। लेकिन बिगाड़ अभी तक वो किसी का कुछ नहीं पाया है। भिन्न-भिन्न मुद्दों पर घेरता तो जरूर है वो सरकार को पर बात बन नहीं पाती। मुद्दा चाहे सीएए का हो या एनआरसी का; वामपंथियों की कोशिश रहती है कि वे अपने कथित विरोध के दम पर सरकार को झुका पाएं लेकिन सरकार ने भी ठान ली है कि वो झुकेगी नहीं। अब तो बात शाहीन बाग के धरना-प्रदर्शन से भी नहीं बन पा रही। शाहीन बाग वामपंथियों के लिए 'क्रांतिकारी स्थल' सा नजर आने लगा है।

वाम दल कभी 'विचार' के लिए जाने जाते थे। प्रगतिशील मूल्यों के मालिक और रखवाले हुआ करते थे। जनपक्षधरता की ऊंची बातें किया करते थे। पूंजीवाद और अमेरिका के जबरदस्त विरोधी हुआ करते थे। समाज में बदलाव लाना तो चाहते थे परंतु मार्क्स और लेनिन की 'विचारधारा' से बाहर कभी नहीं निकल पाए। लेकिन इधर कुछ एक सालों में वामपंथियों ने ऐसी पलटी खाई है कि वे आजकल गांधी की शरण में हैं। हर ऊंचे से ऊंचे वामपंथी की जुबान पर भगत सिंह, मार्क्स, लेनिन, एम एन राय आदि का नाम न होकर सिर्फ गांधी का ही नाम है। अचानक से गांधी के प्रति इतना 'प्रेम' कैसे उमड़ आया उनके दिलों में यह थोड़ा आश्चर्य में डालता है। तो क्या यह मान लिया जाए कि 'गांधी प्रेम' के चक्कर में वामपंथियों ने अपने नायकों को ही 'हाशिए' पर धकेल दिया? उन्हें न अब जरूरत मार्क्स की है न लेनिन की और न ही 'दास कैपिटल' की! रही बात पूंजीवाद के विरोध की है तो अब यह भी बेमानी-सा लगने लगा है। क्योंकि जिस कथित विरोध के लिए वे जिन प्लेटफॉर्म (यथा- फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सएप) को अपनाते हैं, ये पूंजीवादी देशों की ही तो देन हैं। फिर तो उनका यह विरोध 'डिजाइनर विरोध' हुआ न!

कभी वामपंथी वर्ग गांधी की विचारधारा का कट्टर विरोधी हुआ करता था। न उसकी आस्था गांधीवाद में थी न स्वदेशी आंदोलन में। लेकिन अब तो वामपंथियों ने गांधी और गांधीवाद को ऐसा अपनाया है कि सच्चा गांधीवादी भी क्या अपनाएगा! अब उसे गांधी की विचारधारा से कोई परहेज नहीं। दरअसल, वामपंथियों की यह कथित 'गांधी-भक्ति' बीजेपी की काट के लिए है। वे यह दिखाना चाहते हैं कि देखो, जितना बीजेपी गांधी प्रेमी है उससे कहीं बड़े गांधी प्रेमी हम हैं। न सिर्फ गांधी उन्होंने तो अंबेडकर भी अब बहुत प्रिय लगने लगे हैं।

न न इसे वामपंथियों का 'ह्रदय-परिवर्तन' मत समझिएगा। यह तो उनकी कोशिश है बीजेपी के गढ़ में अपने झंडे गाड़ने की। किंतु इस कोशिश में कामयाबी उन्हें मिलेगी, जरा मुश्किल लगता है।

इधर दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार बनने के बाद से वे 'आप' और केजरीवाल के भी जबरदस्त 'फैन' हो गए हैं। उन्हें 'आप' की जीत में अपनी वैचारिक और राजनीतिक जीत दिखाई पड़ रही है। यानी- 'बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना।' यदाकदा मंचों से वे 'आप' की तारीफ भी खुलकर करने लगे हैं। उन्हें 'आप' के विकास में देश का विकास नजर आने लगा है। जबकि हकीकत यह है कि 'गांधी' और 'आप' वामपंथियों की 'मजबूरी' हैं। क्योंकि उनका खुद का जनाधार जनता के बीच अब बचा नहीं है। वे न केवल वैचारिक तौर पर बल्कि राजनीतिक तौर पर भी 'ध्वस्त' हो चुके हैं।

कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि वाम तबके का इतना और इस कदर 'वैचारिक पतन' होगा। खुद को ही वे हाशिए पर धकेल लेंगे। आज साहित्य में भी उनकी वही स्तिथि है, जो राजनीति में है। एक दायरे में सिमट कर रह गया है वामपंथी वर्ग हर कहीं।

सरकार की आलोचना कीजिए। खूब कीजिए। लोकतंत्र आपको यह अधिकार देता है। लेकिन विरोध में इतने अंधे भी न हो जाइए कि देश के खिलाफ नारे लगाने वालों के साथ खड़े होने लगें। यह देश किसी एक पार्टी, किसी एक प्रधानमंत्री का नहीं हम सबका है।

वामपंथियों को अगर मुख्यधारा में आना है तो खुद को बदलना होगा। उसे यह तय करना होगा कि वो गांधी के साथ है या मार्क्स के! दो नाव पर पैर रखकर नदी पार नहीं की जा सकती।

अब तो यह खबर भी पढ़ने में आई है कि वामपंथी पार्टी ने ईश्वर की शरण में जाने का भी मन बना लिया है। अगर ऐसा है तो उसकी उन धर्म और ईश्वर विरोधी स्थापनाओं का क्या होगा, जो कभी उनके विचार और किताबों में दर्ज रहा करती थीं! तो क्या हम यह मान लें कि वाम वर्ग धार्मिक आस्थाओं के सहारे वापसी करने के मूड में है! अगर ऐसा है तो इस पर क्या कहिए!

Sunday, January 19, 2020

कठिन जीवन के बरक्स

प्रतीकात्मक चित्र
 जीवन कभी किसी दौर में 'आसान' नहीं रहा है। न तब का दौर, जब सोशल मीडिया और इंटरनेट नहीं था, आसान था। न अब, जब सोशल मीडिया और इंटरनेट जीवन का महत्त्वपूर्ण हिस्सा हैं, आसान है। जीवन को आसान मान या समझ लेना, हमारी खामख्याली है। जीवन का ऐसा कोई मोड़ नहीं, जहां संघर्ष न हो। कठिनाइयां न हों। और, ऐसा भी नहीं है जिसने इन संघर्षों और कठिनाईयों से पार पा लिया, उसने जीवन को जीत लिया हो। हां, अपने आत्म-संतोष के लिए इसे जीता माना जा सकता है।

अक्सर ही लोगों को कहते सुनता हूं कि आज का समय, जबकि सोशल मीडिया ने सबकुछ को काफी नजदीक ला दिया है, बड़ा आसान है। झट से चीजें यहां से वहां चली जाती हैं। आपस में बातें करना कितना सरल हो गया है। कहीं आने-जाने की जरूरत ही नहीं, बस जहां हैं, वहीं से बैठे-बैठे कुछ भी खरीद लो या बेच दो।

कहना न होगा कि सोशल मीडिया के चलन और इंटरनेट के प्रभाव ने जीवन को 'आरामतलबी' वाला बना दिया है। यही आरामतलबी अब हमारे लिए नासूर बनती जा रही है। पहले दो घड़ी बैठकर जीवन और संबंधों के बारे में सोच-विचार भी लेते थे मगर अब ऐसा नहीं है। अब तो हर जगह से संबंधों को सीमित करने का रिवाज-सा चल पड़ा है। हर कोई अपने समय न मिलने की समस्या बता देता है। जबकि समय सबके पास होता है लेकिन देना उसे कोई नहीं चाहता।

जीवन को हमने एक ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहां दूर-दूर तक रास्ते ही नजर आते हैं, लेकिन मंजिल कहीं नहीं मिलती। जहां मंजिलें नजर आती भी हैं, उनके सौदे हो चुके होते हैं। जो जिस राह चल रहा है, चलने दें टोके नहीं उसे।

मुझे तो अपने आसपास बे-गर्दन लोग ही दिखाई देते हैं। क्या करें, सबकी गर्दनें तो अपने-अपने मोबाइल फोन में घुसी रहती हैं। जो भी बात कहनी-सुननी होती हैं, टच-स्क्रीन पर उंगलियां ही कहती-सुनती हैं। हालांकि इर्दगिर्द शोर तो बहुत है पर यह इंसानों से ज्यादा गाड़ियों का है।

किस्से-कहानियां सुनाने वाली पीढ़ी चला-चली के दौर में है। जो हैं भी उन्हें देने के लिए हमारे पास वक़्त नहीं। पुरानी पीढ़ी के किस्से भी क्या खूब किस्से हुआ करते थे, सीधे उनके जीवन से निकले। जहां जीवन को जाकर खोजना नहीं पड़ता था, वो साक्षात आपके सामने खड़ा रहता था। तरह-तरह के अनुभव देकर जाता था। साहित्य ऐसी कहानियों से बिखरा पड़ा है।

कभी-कभी सोच में पड़ जाता हूं कि हमारी पीढ़ी के पास आगे आने वाली पीढ़ी को देने के लिए क्या है। कितने किस्से-कहानियां हैं। कितने जीवन के टेढ़े-मेढ़े अनुभव हैं। कितनी बातें हैं। सब कुछ को तो हमने एक डिब्बे (मोबाइल) में बंद किया हुआ है। उससे बाहर कुछ भी जाने ही नहीं देना चाहते। मन में एक डर-सा लगा रहता है कि किस्से बाहर आ गए तो क्या होगा? यह डर ही तो हमारे जीवन को कष्टदायक बना रहा है।

रिश्तों में ही अजीब-सा खिंचाव आ गया है। जिन रिश्तों को कभी करीबी माना जाता था, उनमें दूरियां बढ़ गई हैं। हम संबंधों-रिश्तों की परिभाषाएं फेसबुक पर गढ़ने लगे हैं। यहां वो आदमी खुद को बड़ा सौभाग्यशाली मानता है, जिसके फेसबुक पर हजारों की संख्या में मित्र होते हैं। जिसके लिखे को हजारों लोग लाइक करते व टिप्पणी देते हैं। मन में हर समय यह चाह पलती रहती है कि इसमें अभी और इजाफा होना चाहिए।

वहां हमने अपना कुछ भी निजी नहीं रहने दिया है। सबकुछ सार्वजनिक कर डाला है। अब सामने वाले को यह तक पता होता है कि आप कब क्या खा रहे हैं और कितने बजे सोने जा रहे हैं। कहां-कहां घूम-फिर आए हैं।

कुछ लोग इसी लफ्फाजी में जीवन का सुख तलाशते हैं। उनके लिए सबकुछ अब यही है। जमीन से निरंतर कटते जा रहे हैं लोग। जब देखो तो हर शख्स किसी गफलत में डूबा-सा नजर आता है। बेचैन रहता है पर जताता ऐसे है मानो दुनिया का सबसे सुखी आदमी वही है।

अपनों से कटकर वर्चुअल संसार में जीवन का सुख और आराम खोजने वाले कभी खुश नहीं रह सकते। उनके चेहरों पर जिस खुशी को आप देख रहे हैं, दरअसल, वो खुशी नहीं, उनकी हार है। एक ऐसी हार जिसे वे कभी जीत नहीं सकते।

जीवन कितनी आसानी से हमारे ही सामने लुटता जा रहा है। और हम हैं कि खड़े-खड़े तमाशा देख रहे हैं। खुद में ही इतने उलझकर रह गए हैं कि सामने वाले की पीड़ा भी हमें अब दिखाई नहीं देती। मदद को उठाने वाले हाथ भी 'कुछ अपेक्षा' की दरकार रखते हैं। क्या इतने ही असंवेदनशील थे हम?

ये लोग। ये जीवन। कभी ऐसा तो नहीं था। सबकुछ कितना बदल गया है। बदलता जा रहा है। यों, बदलाव बुरे नहीं होते लेकिन हमने तो बदलावों को अपने ही विरुद्ध खड़ा कर लिया है।

जीवन आगे जाकर सरल नहीं और कठिन ही होना है। तब तो हम-आप और हमारे संबंध और रिश्ते और भी कठिनतर हो जाएंगे। फिर क्या कोई ऐसा भी होगा हमारे पास जिसे हम अपना कह पुकार पाएंगे। सोचिएगा जरा।

Wednesday, January 8, 2020

बाजार, किताब और लेखक

किताबों और लेखकों दोनों की दुनिया बदल चुकी है। किताबें अब भी खूब छप रही हैं। लेखक अब भी खूब लिख रहे हैं। बदलाव बस यह आया है कि दोनों के बीच अब बाजार आ गया है। बाजार ने ही दोनों को एक-दूसरे से जोड़ रखा है। आज हर किताब और हर लेखक का अपना बाजार है। इसी के सहारे वे अपने पाठकों तक पहुंच रहे हैं। बाजार की जैसी डिमांड है उस हिसाब से लिख भी रहे हैं। हिंदी और अंगरेजी में यह काम अब बराबर का हो रहा है। बहुत से अंगरेजी के लेखकों की किताबें अनुवादित होकर हिंदी में भी आ रही हैं। अंगरेजी से इतर हिंदी में भी उनका बाजार डेवलप हो रहा है। यह न केवल हिंदी बल्कि बाजार, लेखक और पाठक के लिए भी अच्छा संकेत है।

इस बाजार को बनाने में ऑन-लाइन प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया की भी महत्ती भूमिका है। आज की तारीख में शायद ही ऐसा कोई लेखक होगा, जो सोशल मीडिया पर न हो। या जिसकी किताब ऑन-लाइन उपलब्ध न हो। लेखक अब अपनी किताब खुद ही बेच रहा है। अपने फेसबुक पेज और ट्विटर खाते से अपनी किताबों का प्रचार-प्रसार कर रहा है। इसका फायदा लेखक को यह मिला है कि उसकी पाठकों और दुनिया भर में 'रीच' बढ़ी है। ज्यादा से ज्यादा लोग उसे जानने व पढ़ने लगे हैं। वो स्थापित हो रहा है लेखन की दुनिया में। इस बहाने के एक नई तरह की दुनिया और समाज उसके समक्ष खुल रहा है। नए पाठक मिल रहे हैं। नई प्रतिक्रियाएं सुनने व पढ़ने को मिल रही हैं। और तो और शशि थरूर जैसे अंग्रेजीदां भी कभी-कभार हिंदी में ट्वीट करने लगे हैं। उनकी किताब के हिंदी अनुवाद आ रहे हैं।

यह कहना गलत न होगा कि बाजार और भाषा के टूटते बंधनों ने बहुत हद तक लेखकों और पाठकों को नजदीक लाने का काम किया है। साथ-साथ हिंदी के लेखकों की किताबें भी अंग्रेजी व अन्य भाषाओं में अनुवादित होकर खूब बिक रही हैं।

ऐसा भी नहीं है कि किताबें सिर्फ ऑन-लाइन ही बिक रही हैं। ऑफ-लाइन भी किताबें खूब बेची जा रही हैं। जब बिक रही हैं तो इसका मतलब लोग पढ़ रहे हैं। अक्सर यह ताना मार दिया जाता है कि लोग अब पढ़ते ही कहां हैं। मोबाइल ने पढ़ने की भूख छीन ली है। पर ऐसा नहीं है। जिन्हें पढ़ने का शौक है, वे आज भी पढ़ रहे हैं। चाहे इंटरनेट पर पढ़ें या किंडल पर लेकिन पढ़ रहे हैं। खोज-खोजकर पढ़ रहे हैं। पढ़ने के लिए समय निकाल रहे हैं। युवा पीढ़ी में भी कुछ युवा ऐसे हैं, जिन्हें किताबों से प्रेम है और वे जीभर कर पढ़ते हैं। अपने पसंदीदा लेखक से संवाद भी बनाए रखते हैं।

दिल्ली में हर साल लगने वाला पुस्तक मेला दरअसल हमारे पढ़ने की भूख को जिंदा रखे रहने का एक खूबसूरत आयोजन है। किताबों के दीवाने मेले तक पहुंचते हैं, अपनी पसंद की किताबें खरीदते हैं। इस बहाने उनका उन लेखकों से भी मिलना हो जाता है, जिन्हें वे अब तक पढ़ते आए हैं। उनसे संवाद बनता है।

पुस्तक मेला भी बाजार में किताबों को स्थापित कर रहा है। यह बात अब हर कोई जान-समझ गया है कि बिना बाजार में आए या उसका सहारा लिए अब अपनी किताब को बेच पाना असंभव है। शुद्धतावादी लेखन और लेखकों के जमाने अब लद चुके हैं। लिखा वो जा रहा है, जो बिके। लेखन अगर दिलचस्प होगा तो शर्तिया बिकेगा। श्रीलाल शुक्ल का क्लासिक 'राग दरबारी' इतने वर्ष गुजर जाने के बाद भी आज तक बिंदास बिक रहा है और खूब पढ़ा भी जा रहा है। प्रेमचंद और परसाई को भी पढ़ा जा रहा है। गीत चतुर्वेदी और मानव कौल जैसे कवि युवाओं की पसंद बन चुके हैं।

अब तक इस बात का सेहरा अंगरेजी के लेखकों के सिर पर ही बांधा जाता था कि वे बड़ी खूबसूरती से बाजार में अपनी किताबें बेच लेते हैं। बाजार भी उन्हें हाथों-हाथ लेता है। विज्ञापन के सहारे भी वे अपनी किताब को बाजार और पाठकों के बीच लेकर आते हैं। माना कि अंगरेजी में हिंदी के मुकाबले मैरिट थोड़ी ज्यादा है पर अब हिंदी के लेखक भी खुद को बाजार से जोड़ रहे हैं। वे भी अपनी किताब का प्रमोशन कर रहे हैं। शहरों में लगने वाले पुस्तक मेलों में वे भी अपनी किताब के साथ मौजूद होते हैं। पाठक भी उनके प्रति अब सजग हो रहा है। लेखक और पाठक के बीच फासले घट रहे हैं। यह आवश्यक भी है। हर पाठक को हर लेखक से संवाद का हक है। ताकि वो लेखक के लेखन की रचना प्रक्रिया को जान-समझ सके। कुछ अपनी कहे तो कुछ लेखक की सुने।

इंटरनेट और सोशल मीडिया लेखकों और पाठकों को और नजदीक लाया है। अब कितना आसानी से पाठक लेखकों की पढ़ी हुई किताबों पर अपनी राय रख सकता है। जबकि कुछ समय पहले तक यह इतना आसान न था। तब संवाद की प्रक्रिया काफी इंतजार लेती थी। खत लिखे जाते थे। तब कहीं जाकर जवाब आता था मगर अब लेखक और पाठक दोनों एक-दूसरे के करीब हैं। सोशल मीडिया इस पुल को बहुत खूबसूरती से जोड़े हुआ है।

पुस्तक मेला एक दिल्ली ही नहीं बल्कि देश के हर शहर, गांव-कस्बों में निरंतर लगते रहने चाहिए। इससे लोगों के भीतर किताब को खरीदकर पढ़ने की आदत तो बनेगी ही साथ-साथ किताबों की बाजार में डिमांड भी बढ़ेगी। बाजार और किताब को एक-दूसरे का पूरक बनना ही होगा। जैसे-जैसे डिमांड बढ़ेगी, कॉम्पिटिशन भी बढ़ेगा; फायदा लेखक और किताब को ही होगा। पाठकों को भी अच्छा पढ़ने को मिल जाया करेगा।

यह समय बाजार का है। जिस लेखक ने खुद को बाजार के अनुरूप ढाल लिया फिर उसे 'हिट' होने से कोई नहीं रोक सकता।

Thursday, October 10, 2019

बाजार और त्योहार

त्योहार सिर पर हैं। ऑनलाइन बाजार तैयार है। सेल लगी हुई है। जमकर डिस्काउंट दिया जा रहा है। टीवी और अखबारों में आने वाला हर विज्ञापन कह रहा है कि खरीदो, खरीदो। मौका हाथ से न जाने दो। इस दफा चूके तो उम्र भर पछताओगे।

सबसे सस्ते की परिभाषा क्या होती है, यह बाजार हमें समझा रहा है। बाजार भी यह चाहता है कि हम त्योहार को छोड़ खरीददारी और सेल के बीच ही उलझे रहें। एक से बढ़कर एक ऑफर्स हैं। सबकुछ जीरो ईएमआई पर उपलब्ध है। हर सामान अपनी जेब के मुताबिक।

बाजार और त्योहार को मोबाइल आपस में जोड़े हुए है। टचस्क्रीन पर लगातार दौड़ती उंगलियां मानो कुछ भी छोड़ना नहीं चाहतीं। मोबाइल पर ही सारी ऑनलाइन खरीददारी हो रही है। इसी पर एक-दूसरे को त्योहार की बधाईयां भी दी जा रही हैं।

न कहीं बाहर आना है न जाना। घर बैठे जो चाहो खरीदो। किसी को भी विश करो। फ्री डेटा और अनलिमिटेड कॉल के युग में हर रिश्ता करीब जान पड़ता है।

ऑनलाइन बाजार बहुत कम समय में बहुत तेजी से हमारी जरूरत बन गया है। त्योहार की परिभाषा-भाषा ही बदलकर रख दी है इसने। आजकल के बच्चे त्योहार का मतलब सिर्फ खरीददारी ही समझते हैं। त्यौहारों का हमारे जीवन में क्या अर्थ, क्या महत्त्व है उन्हें नहीं पता। दोष उनका भी कहां है? खुद हमीं ने कहां उन्हें ये सब बताने का कभी प्रयास किया। जैसे हम दिनभर मोबाइल और ऑनलाइन बाजार में उलझे रहते हैं, बच्चे भी यही सीख रहे हैं।
एक समय ऐसा भी था, जब त्योहारों पर लगता था कि त्यौहार हैं। सब एक साथ एक-दूसरे से मिलते थे। त्योहारों की परंपरा का ध्यान रखा जाता था। उन्हें उत्सव की तरह मनाया जाता था। तब बाजार का भी हम पर ऐसा प्रभाव नहीं था। मां-बाप जो खरीदकर दे देते थे, खुशी-खुशी पहन लेते थे। किसी के बीच स्मार्ट लगने-दिखने की कोई हिरस नहीं थी।

तब बाजार और कपड़ों से कहीं ज्यादा महत्त्वपूर्ण त्योहार हुआ करते थे। अब त्योहारों पर लोगों को देखो तो ऐसा लगता है कि किसी फैशन परेड का हिस्सा बनने आए हैं। अब ये खबरें चौकाती भी नहीं कि किसी बड़ी कंपनी के कुछ घण्टों में हजारों मोबाइल बिक गए।

हां, यह सच है कि ऑनलाइन बाजार ने बाजार और खरीददारी को हमारे लिए बेहद आसान कर दिया है। अब कुछ भी खरीदने के लिए सड़कों या दुकानों पर भटकना नहीं पड़ता। एक क्लिक में हर चीज घर बैठे आपके सामने होती है। सेल और डिस्काउंट का नशा अलग ही होता है।

जिसके पास समय की कमी है, वो भला क्यों बाजार में जाकर धक्के खाएगा। यह होड़ भी हमारे बीच खूब चली है कि जब पड़ोसी ऑनलाइन चीज खरीद सकता है तो मैं क्यों नहीं? मोबाइल पर उंगलियां या तो सन्देश भेजने के लिए चलती हैं या फिर खरीदने के लिए।

ऑनलाइन बाजार के बढ़ते प्रभाव ने दशहरा, दिवाली जैसे त्योहारों की प्रासंगिकता को बहुत हद तक नुकसान पहुंचाया है। अपनों के बीच होकर भी हम उनके बीच नहीं होते। दशहरा, दीवाली का क्या महत्त्व है, बच्चे उतना ही जानते-समझते हैं, जितना उन्होंने अपने कोर्स की किताबों में पढ़ रखा होता है।

हमने अपना सारा सोशल सर्कल समाज के बीच से हटाकर सोशल मीडिया पर शिफ्ट कर दिया है। सारी सामाजिकताएं वहीं निभाई जा रही हैं। सारे सुख-दुख इसी पर बांटे जा रहे हैं।

आलम यह है कि त्योहार आ रहे हैं ऐसा कुछ हमें अहसास ही नहीं होता। एक वो दौर था जब हफ्ते भर पहले त्योहारों की तैयारियां शुरू हो जाती थीं। मगर अब तो सबकुछ रेडीमेड और ऑनलाइन है।

कभी-कभी तो लगता है कि त्योहारों पर कितना खरीदते हैं हम। बाजार ने इतनी बुरी तरह हमें अपनी गिरफ्त में ले लिया है कि उससे बाहर अगर निकलना चाहें तो भी नहीं निकल सकते। खरीददारी का ऐसा जाल बुना जे बाजार ने हमारे इर्द-गिर्द कि कितना बचेंगे।

हम दूसरों से ही नहीं, खुद अपने आप से कटते जा रहे हैं। इतना सीमित कर लिया है हमने अपनी जिंदगी को कि जहां उत्सव और त्योहार भी अब ज्यादा मायने नहीं रखते।

हर त्योहार का मूल स्वभाव आपस में जोड़ना, उमंग-उत्सव बनाए रखना, व्यस्तताओं से निजात पाना होता है। लेकिन हमने तो खुद को बाजार के हवाले कर दिया है। बाजार आकर्षक दे सकता किंतु सुकून नहीं दे सकता। रिश्तों में गर्माहट, सरलता, अपनापन नहीं डाल सकता। त्योहार का महत्त्व नहीं बता सकता। दिलों में उमंग का संचार नहीं कर सकता।

बावजूद इसके हमारे मध्य ऑनलाइन बाजार की चकाचौंध निरंतर बढ़ती ही जा रही है। यह कहां जाकर रुकेगी या कभी रुकेगी भी; कोई नहीं जानता। त्योहार आएंगे-जाएंगे मगर बाजार हमें यों ही अपने मोहपाश में बांधे रहेगा। क्या करें, हमारा व्यवहार और दिमाग कुछ इस तरह का विकसित हो चुका है, जहां बाजार ही सबकुछ है, रिश्ते नहीं।

बीते वक़्त का एक नॉस्टेल्जिया ही हम अपने मन में पाल सकते हैं। सच यही है कि न वो वक़्त और न वो त्योहारों की तासीर ही वापस लौटेगी। बाजार और त्योहार के बीच एक-दूसरे को लुभाने की कोशिशें आगे भी ऐसे ही जारी रहेंगी।

Friday, October 4, 2019

बेकाबू होता सोशल मीडिया

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से सोशल मीडिया (जैसे- फेसबुक, व्हाट्सएप) पर नकेल कसने को कहा है। और, कुछ गलत नहीं कहा है। अब वाकई समय आ गया है, जब केंद्र सरकार सोशल मीडिया के खिलाफ कोई सख्त निर्णय ले।

माना कि सोशल मीडिया स्वतंत्र अभिव्यक्ति का एक बड़ा माध्यम है। यहां कोई भी अपनी बात खुलकर कह-लिख सकता है। दोस्त बना सकता है। फ़ोटो शेयर कर सकता है। हर विषय पर स्टेटस चढ़ा सकता है। लेकिन, यहां किसी को ट्रोल करने या अभद्र भाषा का प्रयोग करने का हक किसी को नहीं है। सुप्रीम कोर्ट की चिंता भी यही है। एक जज ने तो सोशल मीडिया को इतना खतरनाक बताया कि यहां से वे आधे घंटे में एके-47 भी खरीद सकते हैं।

ट्रोलिंग सोशल मीडिया का सबसे घृणित पक्ष है। आप सरकार या किसी व्यक्ति के विरुद्ध असहमति जतला दीजिए, फिर देखिए आपको यहां कैसे और किस हद तक ट्रोल किया जाता है। ट्रोलिंग में अभद्र भाषा का जिस तरह प्रयोग किया जाता है, उसे किसी भी सूरत में उचित नहीं कहा-माना जा सकता।

अभी हाल मशहूर अभिनेत्री सोनाक्षी सिन्हा को, केबीसी में एक सवाल का उत्तर सही न दे पाने के कारण, जिस तरह फेसबुक और ट्विटर पर ट्रोल किया गया, वो बहुत ही दुखद था। कोई जरूरी तो नहीं सबको हर विषय का ज्ञान हो ही। कभी-कभी बहुत ही साधारण से सवाल पर हम भी चूक जाते हैं। कई पढ़े-लिखे लोग ऐसे भी देखे गए हैं, जिन्हें हिंदी का क ख ग तक नहीं आता था। तो क्या हम उन्हें ट्रोल करने बैठ जाएंगे। सुबह-शाम सोशल मीडिया पर उनका मख़ौल उड़ाएंगे। उन्हें तरह-तरह के ताने देंगे। उनके विरुद्ध दुष्प्रचार करेंगे।

कहना न होगा, सोशल मीडिया पर सबसे अधिक प्रताड़ित महिलाओं को किया जाता है। उन पर तरह-तरह की टिप्पणियां की जाती हैं, मीम बनाए जाते हैं, उनके खिलाफ भद्दी भाषा का प्रयोग किया जाता है। वीडियो बनाकर उनका दुष्प्रचार किया जाता है। इस सब पर लगाम कसना बेहद जरूरी है।

कभी-कभी तो सोशल मीडिया 'बंदर के हाथ में उस्तरा' जैसा आभास देता है। किसी की भी गर्दन पर वार करने को तैयार।

सबसे ज्यादा शिकायत यहां भाषा को लेकर है। शर्म तब अधिक आती है, जब पढ़ा-लिखा वर्ग भी किसी के खिलाफ नीच भाषा का इस्तेमाल करता है। खुलेआम गालियां बकता है। ऐसा लगता है, टिप्पणी करने की जल्दबाजी में हमने अपनी भाषा पर ठहरकर सोचना बिल्कुल छोड़ ही दिया है। जरा-सी आलोचना पर ही ऐसे आपे से बाहर हो जाते हैं कि कुछ पूछिए मत। हद यह है कि व्यक्ति के खिलाफ निजी (अश्लील) टिप्पणी करने से भी नहीं चूकते।

सोशल मीडिया लत से कहीं ज्यादा बीमारी बनता जा रहा है। हर समय निगाहें फोन पर टिकी रहती हैं। उंगलियां टच-स्क्रीन पर रपटती रहती हैं। न हम आपस में किसी से मिलते हैं, न दो घड़ी बैठकर हाल-चाल लेते हैं। दुख-सुख भी फेसबुक और व्हाट्सएप पर ही शेयर कर फर्ज अदायगी कर देते हैं। खाना खाते वक़्त भी निगाहें मोबाइल से दूर नहीं रह पातीं। आखिर यह सब क्या है? कहां लिए जा रहे हैं हम अपने आप को?

अक्सर लगता है, हम मोबाइल को नहीं, मोबाइल हमें चला रहा है। हमारा इस्तेमाल कर रहा है।

हत्या और आत्महत्या की घटनाएं जिस तेजी से सामने आ रही हैं, ये संकेत भी सुखद नहीं हैं सोशल मीडिया के लिए। कैसे-कैसे लोग हैं, जो अपनी आत्महत्या का वीडियो खुद ही यहां वायरल कर देते हैं। फिर उन वीडियो पर आने वाले कमेंट तो और भी अभद्र होते हैं। कुछ लोगों को ट्रोलिंग का सामान मिल जाता है।

वैसे, सोशल मीडिया (खासकर- फेसबुक और ट्विटर) को आधार से जोड़ने का प्रस्ताव भी बुरा नहीं। इससे कुछ हद तक तो लगाम लगेगी ही। फेक एकाउंट्स और खबरों में भी थोड़ी कमी आएगी। वरना तो होता यह है कि कैसी भी उल्टी खबर को सही बनाकर वायरल कर दिया जाता है। यह कहना गलत न होगा कि सोशल मीडिया पर 80 फीसद खबरें फेक ही होती हैं। कई दफा तो समझदार लोग भी उन फेक खबरों को सही मान साझा कर देते हैं।

समाज में कितने ही फसाद फेक न्यूज के कारण भड़के हैं। पिछले दिनों भीड़ द्वारा हिंसा में जो बढ़ोतरी हुई उनमें फेक न्यूज़ का बहुत बड़ा हाथ है। कुछ ही मिनट में किसी भी खबर का वायरल हो जाना, चिंता का सबब बनता जा रहा है। सही और गलत की पहचान होना जरूरी है। नहीं तो बेकसूर लोग बेवजह ही मारे जाते रहेंगे।

इस सब के बावजूद कुछ लोगों ने समझदारी और धैर्य से काम लेते हुए खुद को सोशल मीडिया से दूर भी किया है, निरंतर कर भी रहे हैं। धीरे-धीरे वापस अपनी सामान्य जिंदगी में लौटने लगे हैं। खाली समय किताबों के साथ गुजारने लगे हैं। आपसी रिश्तों-संबंधों को मजबूत कर रहे हैं। न फेक न्यूज़ पर विश्वास करते हैं, न ही उसे शेयर करते हैं। ट्रोलर्स को भी मजा चखाना उन्होंने शुरू कर दिया है। यह सब जरूरी है। नहीं तो हम ट्रोलिंग, फेक न्यूज़, अभद्र भाषा आदि के अंधे कुएं में ही यों ही डूबते चले जायेंगे।

बेहतर तो यही रहेगा कि केंद्र सरकार जितना जल्दी हो सके सोशल मीडिया के खिलाफ सख्त कानून बनाए। ताकि बात-बात पर इसका दुरुपयोग करने वालों पर अच्छे से लगाम कसी जा सके।

सोशल मीडिया की शुरुआत अपनों को नजदीक लाने, अनजान लोगों से मित्रता बढ़ने के लिहाज से की गई थी, नाकि किसी को ट्रोल करने या किसी के खिलाफ दुष्प्रचार करने को। इसके लिए हमें खुद को सुधारा ही होगा।

गांधी को याद करने की होड़

अभी कुछ दिन पहले भगत सिंह को याद कर हम 'मुक्त' हुए ही थे कि अब गांधी को याद करने लग गए। जिधर नजर उठकर देखो उधर ही गांधी को याद किया जा रहा है। गांधी-गांधी की ऐसी धूम मची है अगर गांधी ये सब देख लें तो निश्चित ही शर्मा जाएं। क्या दक्षिणपंथी, क्या वामपंथी, क्या बौद्धिक, क्या अ-बौद्धिक हर कोई गांधी का विशेषज्ञ बनकर उन पर कुछ न कुछ कह-लिख रहा है।

अभी कल तक ही तो भगत सिंह की ओर लौटने, उनकी विचारधारा को अपनाने को कहा जा रहा था, अब गांधी की ओर लौटने और उनके गांधीवाद को अपनाने को कहा जा रहा है। मतलब- अभी हम यही तय नहीं कर पाए हैं कि हमें रहना किस विचारधारा के साथ है। किसे मानना है, किसे छोड़ देना है।

हर तरफ से गांधी को अपने-अपने खेमों में खींचने की कोशिशें हो रही हैं। ऐसा ही कुछ पिछले दिनों डॉ. अंबेडकर के साथ भी किया गया था। जिन्होंने कभी गांधी जैसा जीवन जिया नहीं, जिनका दिन-रात मोबाइल और सोशल मीडिया पर मटरगश्ती करके गुजरता है, वे भी गांधीवाद पर लेक्चर दे रहे हैं। जिन्होंने शायद ही खुद जीवन में कभी खादी पहनी हो, वे हमसे खादी पहनने-अपनाने को कह रहे हैं। कभी जिन्होंने सादा जीवन नहीं जिया, हमसे सादा जीवन जीने को कह रहे हैं।

अपने महापुरुषों के प्रति हमारे मन में कितना 'नकलीपन' है, इसे हमने अभी हाल भगत सिंह को याद करते हुए देखा और अब गांधी को याद करते हुए साफ देख पा रहे हैं। जबकि सत्य यह है कि सामान्य जीवन में न मतलब हमें गांधी से रहता है न गांधीवाद से। गांधी की तस्वीर के नीचे बैठ हम क्या कुछ नहीं करते। गांधी के सत्य को आत्मसात करने की हिम्मत भी किसी के भीतर नहीं। लंबे-लंबे भाषण चाहे जितना दे लें। इसे ही तो कहने और करने में फर्क कहा जाता है।

हर तरफ एक होड़-सी मची है कि कौन व्यक्ति, कौन नेता, कौन पार्टी, कौन संगठन गांधी को कितना और किस सीमा तक याद कर सकता है। जिन्हें सालभर गांधी से कोई सरोकार नहीं रहता, वे भी उन्हें ऐसे याद कर रहे हैं मानो वे ही उनके सबसे बड़े भक्त हों।

नकली गांधीवाद का चलन हमारे जीवन में इस कदर बढ़ गया है कि जहां देखो उधर ही झोल नजर आता है।

आजकल सबसे ज्यादा बहस चल रही है गांधी और भगत सिंह के बीच व्याप्त वैचारिक मतभेद को लेकर। सोशल मीडिया पर जाने क्या कुछ नहीं लिखा जा रहा। इतिहास की जानकारी किसी को है नहीं लेकिन जिद ऐसी कि हम ही इतिहास के सबसे बड़े जानकर हैं। सोशल मीडिया पर जितनी भी चीजें आ रही हैं सब व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी की ईजाद हैं। उनका काम ही रात-दिन तरह-तरह के भरम देश, समाज और लोगों के बीच फैलाना है। कोई भगत सिंह के बरक्स गांधी को खड़ा कर रहा है तो कोई गांधी के बरक्स भगत सिंह को। समाज में इतना दुष्प्रचार फैला दिया गया है कि यह तय कर पाना ही मुश्किल होता जा रहा है कि कौन सही है और कौन गलत।

गांधी और भगत सिंह के बीच मतभेद की सही जानकारी व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी कभी नहीं दे सकती। ये आपको उन पर लिखी गईं प्रामाणिक किताबों से ही मिल सकती है। क्रांतिकारियों का इतिहास पढ़िए, सबकुछ उनमें दर्ज है।

जब आप गांधी पर बात करते हैं या भगत सिंह पर तब आपको अन्य क्रांतिकारियों पर भी बात करनी पड़ेगी। उन गुमनाम क्रांतिकारियों का इतिहास भी जानना होगा, जिन्होंने देश की खातिर बलिदान दिया। सिर्फ गांधी या भगत सिंह को याद कर लेने भर से ही हम अपने क्रांतिकारी नायकों के साथ न्याय नहीं कर पाएंगे।

हो दरअसल आजकल यही रहा है कि हमने गांधी और भगत सिंह पर अपने ज्ञान को सीमित कर लिया है। जो सोशल मीडिया पर आ रहा है, उसे ही 'अंतिम सत्य' मान यहां-वहां प्रचारित किया जा रहा है। ये कच्चे तथ्य और अधिक भ्रम फैला रहे हैं समाज के बीच।

गांधी, गांधीवाद और उनकी राजनीति को समझना इतना सरल नहीं कि एक दिन में विशेषज्ञ बन जाएं। ये सब जानने-समझने के लिए आपको इतिहास के कटु सत्य से रू-ब-रू होना ही पड़ेगा।

ऐसे जाने कितने ही वैचारिक मतभेद नेहरू और गांधी के बीच भी थे। पर हम उन पर बात या बहस करने से बचते हैं। क्योंकि हमारे अपने-अपने राजनीतिक और साहित्यिक एजेंडे हैं। यहां कथित प्रगतिशील बुद्धिजीवियों की भूमिका तो और भी अधिक हास्यास्पद लग रही है। वाम बुद्धिजीवियों का गांधी के प्रति प्रेम अचानक से इतना बढ़ गया है कि विश्वास ही नहीं हो रहा। वे गांधी में अपने नायक को तलाश रहे हैं।

गांधी को सिर्फ महिमामंडन की वस्तु न बनाइए। उन पर लिखी गई आलोचना को पढ़ने और आत्मसात करने की भी आदत डालिए। इतिहास किसी को माफ नहीं करता, चाहे वो कोई हो। उसके गर्भ में हर एक का सच, झूठ और नकलीपन छिपा रहता है।

ध्यान रखे, गांधी को 'सिर्फ याद' करने की 'होड़' किसी तार्किक मुकाम तक नहीं ले जा पाएगी। जब तक की हम क्रांतिकारी इतिहास की सच्चाईयों से रू-ब-रू नहीं हो जाते।

Monday, August 19, 2019

डायरी

पिछली बरसात में
डायरी के कुछ पन्ने
गीले हो गए थे
पर उस पन्ने को मैंने
गीला होने से बचा लिया था
जिस पर तुम्हारा नाम दर्ज था